यह बात है 1671 जब दिल्ली पर शासन था औरंगज़ेब का ओर लोहारू रियासत पर शासन था ठाकुर मदन सिंह का तो ठाकुर को औरंगजेब ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने को कहा पर ठाकुर मदन सिंह ने औरंगजेब की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया
• इसी बात पर औरंगजेब घुसा होकर अपने सेनापति अलूफ खान को 1671 ई को भारी लक्सर के साथ दिल्ली से लुहारू पर आक्रमण करने भिजा
• यह बात ठाकुर मदन सिंह को पता सलती हैं तो वो अपने सेनापति बखत सिंह ओर मदन सिंह के दोनों राजकुमारो को एक बड़ी राजपूती सेना देकर युद्ध भूमी की ओर रवाना कर दिया
• बखत सिंह के साथ उनका एक वफादार कुता भी उनके साथ सालता है कुता बहुत समझदार था ओर जब अलुफ खान ओर बखत सिंह का आमना सामना होता है तो दोनो अपनी अपनी सेना के साथ एक दूसरे पर हमला कर देते है
• रणभूमि को लोहारू के राजपूतों ने मुगलों के खून से लाल कर दीया था युद्ध 2 दिन तक सला इस भीसन युद्ध में ठाकुर के दोनों राजकुमार युद्ध भूमि में वीर गति को प्राप्त हो गए थे
• पर बखत सिंह अभी भी मुगलों पर भारी था क्योंकि उनके पास जो उनका वफादार कुता था वो बखत सिंह का सुरक्षा कवच था जैसे ही कोई मुगल सैनिक बखत सिंह के पिसे से या साइड से कोइ वार करता तो वो वफादार कुता शेर के भाती मार गिराता उस अकेले वीर कुत्ते ने कई मुगली सेनिको को घायल किया था 29 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया बखत सिंह ओर बाहदुर कुते के सामने अलूफ खान ओर बसे कसे कुस सेनिक अपनी जान बसाकर भागकर दिल्ली गए थे औरंगजेब की हार हो गई लोहारू विजय हुआ
• जब ठाकुर मदन सिंह युद्ध भूमी में आए तो लासोका से रण भूमि सजी होई थी उनको ओर बखत सिंह ओर उनका कुता आखिर सास ले रहे थे बहुत जख्मी होने के कारण वो वीर गति को प्राप्त हो गए मदन सिंह ओर उनके वफादार कुत्ते की याद में मदन सिंह ने दो चतरिया बनाई जो आज भी मौजूद है।