वीरमदेव सोनगरा और फिरोज की प्रेम कहानी veeramdev Chauhan , viramdev sonagra or firoza parim kahani,

 मरने के बाद भी प्रेम को स्वीकार नही किया विरम देव सोनगरा 



 1305 ई में जालोर के राजा कान्हड़ देव के पुत्र विरम देव दिल्ली गए थे अलाउद्दीन के बुलावे पर विरम देव एक सुन्दर राजकुमार थे 
० विरम देव दिल्ली में कुस दिन बिताते वो मल युद्ध में कोसल थे अलाउद्दीन खिलजी के साही पेलवानो को हरा दिया था अलाउद्दीन खुद दिन भर विरम देव की परसंता करता रहता था एक दिन अलाउद्दीन खिलजी की पुत्री सहजादी फिरोजा विरम देव को देखकर उनसे प्रेम करने लगी थी ओर मन ही मन में विरम देव को अपना पति मान सूकी थी 
० फिर वो अलाउद्दीन खिलजी को कहती है की में विवाह करुगी तो शरीफ विरम देव से ही करुगी तो तो अलाउद्दीन अपनी पुत्री की जिद ओर उसकी खुशी के लिऐ वो फिरोजा की बात मान गए अगले दीन दरबार में फिरोजा के सादी का प्रस्ताव विरम देव के सामने रखकरउनको कहते हैं की यह हिन्दुस्थान की जहगीर तुमारे नाम कर दुगा हिन्दुस्थान तुमारा हो जाएगा बस आप मेरे दामात बन जाय फिरोजा से निकाह कर लो 

० विरम देव वाह पर भरे दरबार में कहते हैं की 
मामा लाजे भटिया कुल लाजे चौहान हु।
परनु तुरकनी तो पसीम में उगे भान ।
उनका कहना था के मेरा नहनियाल है जो भाटी राजपूतों मे है ओर मेरा जन्म चौहान कुल में हुआ है सूरज उतर से पश्चिममें भी उग जाय तो भी में एक तुरकनी के साथ विवाह नही कर सकता 
० यह कहकर विरम देव दिल्ली से जालोर आ गए थें पर अलाउद्दीन खेलजी यह अपमान सेन नही कर सका वो आहकार में आकर दिल्ली से जालोर की तरफ एक बड़ी फोज लेकर निकल पड़ा था फिरोजा ने अलाउद्दीन को कहा था की अपु जान विरम देव को जिन्दा लाना ओर जिंदा ना मेले तो भी उसका मृतिक सरीर लेके जरूर आना 
० अलाउदीनखेलजी जालोर को सारो तरफ से घेर लेता है 8 महीनो तक घेरा रखता है मगर दुर्ग में बैठे राजपुत सैनिक इनके उपर हमला करते रहते जिसके कारण अलाउद्दीन की सेना दिनो दिन कमजोर होती जा रहीं थीं  जिसके कारण अलाउद्दीन वापस दिल्ली जाने का इरादा बनाते हैं 
०  मगर तभी दुर्ग का एक सरदार विका दहिया अलाउद्दीन की सावनी में आकर दुर्ग का गुप्त मार्ग एक शर्त पर बता देते है की उसको जालोर का सूबेदार बनाएगे ओर अलाउद्दीन ने सोने के सिक्के देकर भिज़ दिया और अलाउद्दीन गुप्त मार्ग से दुर्ग में घुस जता है 1311 ई जालोर दुर्ग में जोहर होता है ओर विरम देव ने सर कटने के बाद भी अलाउद्दीन की फोज का सफाया करते रहे थे यह देखकर अलाउद्दीन और उनकी सेना भयभीत हो गई थीं और आखिर कार अलाउद्दीन जीत तो गया था मगर उसका नुकसान जीत से गई गुणा जायदा हुआ था।
फिर अलाउद्दीन विरम देव सोनगरा का कटा हुआ सर सोने की थाली में सजा धजा कर दिल्ली ले गया 
० फिरोजा ने जब यह खबर सुनी तो वो एक हिंदू दुल्हन की तरह तैयार होकर विरम देव के सर को न्हारने के लिए वो दिल्ली के दरबार में आती है जैसे ही विरम देव के सर के सामने आती है तो वो सर फिरोजा से उल्टा गुम जाता है यह देखकर अलाउद्दीन और उसके सूबेदार आसरिय सिकत हो गए थे मगर फिरोजा ने कहा 
  तख्त तुरकानी चाल हुई हिनवानी 
मारा भो - भों रा भरताल सर ना धुन सोनगरा 
  B फिरोजा ने कहा के में आपरे खातिर हिन्दू बनने के लिऐ तैयार हूं आप मेरे सात जन्मों के भरताल हो आप अपना सर मुझे देखकर मत गुमाइये फिर फिरोजा विरम देव का सर लेकर युमना नदी में सलाग लगा देती हैं ओर हिंदू सत रानी की तरह जल जोहर कर के अपने पति के पीसे सती हो जाति है 

 

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