सुरवीर कलाजी राठोड़, मेड़ता का योद्धा कालाजी, कलाजी मेड़तिया का इतिहास

मेडता का शूरवीर योद्धा कालाजी राठोड़ 

 • वीर कल्लाजी राठौड़ का जन्म 1544 ई मे मेडता रियासत नागोर के समियाना गांव में हुआ था 

कल्लाजी के पिता का नाम  असलसिंह था जो मेड़ता के राजा जयमल जी के भाई थे 

•  कल्लाजी बाल अवस्था में अपने काका जयमजी के वहा मेडता आगए थे जलमल जी ने खुद कल्लाजी को तलवार, ढाल, धनु विधियां दी और हर परकार की लडाई करने में सक्षम बनाया 

 • 1562 ई में मेड़ता और दिल्ली के बीच कई छोटे मोटे टकराव होने लगे मुगल बादशाह अकबर हर हाल में मेडता रियासत को अपने आधीन करना चाहता था मगर राव जयमल जी हमेशा उसको तीखा जबाव देते थे 

• अकबर ने अपनी विशाल फोज के साथ सेनापति  शरफुद्दीन हुसैन मिर्जा को मेडता पर हमला करने भीजा शरफुद्दीन हुसैन मिर्जा ने मेड़ता दुर्ग को सचारो तरफ से गेर दिया और अन और रसद केले में जानें वाली सारी बंद करवा दि  

•जयमल जी राठौड़ और कल्लाजी राठोड़ ने मुगल फोज के ऊपर कई साफे मार आक्रमण करके मुगल फोज का बड़ा नुक्सान किया मगर केले में अनाज आने के सारे रास्ते बन्द थे ओर मुगल फोज दिनो दीन किसानो ओर परजा को पीड़ित करती इसीलिए जयमल जी ने अपने हालत को समझा ओर फैसला किया की अगर हम अभी जीवित रहिगे तो भावसीय में मुगलों का विनाश जरूर करीगे 

 • अब जयमल जी ओर कल्लाजी अपनी छोटी सी सेना की टुकड़ी और अपने सहित लोगो के साथ चित्तौड़गढ़ जाने का फैसला करते हैं रात को मेडता से चित्तौड़गढ़ की तरफ निकल पड़ते हैं रास्ते में 50 या 60 लूटेरे भी मिले थे मगर राव जयमल जी की देस भगति देखकर डाकुओं ने भी जयमल जी का साथ दिया 

•अब कल्लाजी ओर जयमल जी काके भतीज दोनो  चित्तौड़गढ़ राणा उदय सिंह की सरण में आ जाते है उदय सिंह ने बहुत समान किया और दिनो काके भतीज को भेट सरूफ ओर रहने के लिऐ जहगिरे दी 

•कल्लाजी को रनेला की जहागीर दी कल्लाजी राणा उदय सिंह के कई युद्धों में अपनी सुरविरता का परिषय दिया 

• अब अकबर के रास्ते का सबसे बड़ा काटा चित्तौड़गढ़ था इसलिए अकबर 1568 ई में अकबर खुद 80000 से अधिक सेनिको के साथ चित्तौड़गढ को घेर लेता है कई दिनो तक दोनो तरफ से एक दूसरे पर हमले होते थे मुगलों की ज्यादा सखियां में होने के करण जयमल जी, ओर कलाजी,चुंडावत जी, ओर कई सामंथो ने उदय सिंह को उनके परिवार सहित सूचित ओर  सुरक्षित स्थान भिजा 

• 1567 ई का दिन जब कल्लाजी अपने काका के साथ मुगल बादशाह अकबर से लड़ने निकल पड़ते है चित्तौड़गढ से 8000 हजार सैनिकों के साथ और राव जयमल जी की पत्नी और कई दासियों के साथ जोहार करती है 

• युद्ध में महलों के लासो का ढेर लगाता जा रहा था अकबर खुद कल्लाजी की वीरता देखकर टग रह गया दिनो हाथो में उधाए तलवार में मुगलों को लग रहा था जैसे उनका काल उनसे लड़ने आया हो  

• कल्लाजी ने अपने काके जयमल जी की तरफ देखा तो इनके पेरो में गाव लगने के कारण वो गुटनो के बल पर युद्ध लड़ रहे थे तो कल्लाजी ने जयमल जी को अपने कंधो पर बैठा दिया अब यह रूप देखकर मुगल फोज मे भगदड़ मच गई थी काका भतीजा दोनो हाथो में लिए तलवारो से मुगलों को काटते जा रहे थे 

•  आखिर कार अकबर ने अपनी फोज की यह दशा देखकर जयमल जी के सीने में सुपके से गोलियां सलवा दी जयमल जी कल्लाजी के कंधो से निसे गिर गई और वीर गति पराप्त हो गए अब कल्लजी का रूप और विकराल हो गया था जितने भी मुगल सैनिक उनके सामने आते सारे मारे जाते अब अकबर ने योजना बनाकर धोखे से कल्लाजी का सेर कटवा दिया सेर कट गया पर धड़ लड़ता हुआ अपनी गोडी पर सवार जाहगीर रनेला पहुस गया वहा पर उनकी पत्नी ने धड़ के साथ सती हो गई ओर इतिहास में हमेसा के लिए अमर हो गई 

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 अकबर ने चित्तौड़गढ पर कब्जा तो कर दिया था पर जीत से जायादा उसका नुक्सान हुआ था 


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